शनिवार, 2 जुलाई 2016

हम बस भीड़ हैें

हम बस भीड़ हैें
हम सब भीड़ की ऊंगली थामे वक्त के अंधेरे में खो गए हैं। कहीं कोई लड़खड़ाता है तो कुछ मोमबतियां उसकी याद में जला लेते हैं, कुछ मशालों की लपटे आसमान तक पहुंच जाती, कुछ पल के लिए रोशनी आ जाती, फिर थाम लेते भीड़ की ऊंगली और वक्त के बीच रास्ता बनाने लगते हैं। हममे नहीं हैं ताकत अकेले चलने की, हम भीड़ का आसरा खोजते हैं। क्योंकि आसान है भीड़ के साथ चलना, खुद कदम न भी बढाओ तब भी मंजिल तक तो पहुंच ही जाओगे। बिना किसी जद्दोजेहद और मेहनत के। पर रहोगे भीड़ का हिस्सा ही मैं या तुम नहीं। 

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