प्यार और नफरत एक साथ तब ही चलतें हैं जब आपकी भावना खुद से ज्यादा जुड़ी होती है। दूसरे व्यक्ति का स्वतंत्र वजूद वास्तव में आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता। वह बस उस दीवार की तरह होता है जहां से टकराकर आपकी भावनात्मक बाॅल वापिस लौटती है। आप उम्मीद करते हैं कि जितनी शक्ति से आपने उस बाॅल को दीवार की तरफ फेंका है उतनी ही शक्ति से वह वापिस भी हो। दीवार आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं बाॅल आपके लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह आपका है और उसमें लगी शक्ति भी आपकी है। हमें लगता है कि हम दूसरे व्यक्ति से प्यार करते हैं, वास्तव में हम प्यार खुद से करते हैं व्यक्ति विशेष से नहीं। और वह प्यार तभी तक फलता फूलता है जब तक वह आपकी लगाई शक्ति का रिटर्न देता है। अगर नहीं देता तो हम उससे नफरत करने लगते हैं। क्योंकि वह हमारे अहं पर चोट पहुंचाता है। हमारी उस शक्ति के सामने प्रश्न चिन्ह लगाता है जिसके भरोसे हमने अपनी भावनात्मक बाॅल दीवार की तरफ फेंकी थी। यानी हम अपने आप से बाहर तो निकले ही नहीं, फिर किस बात का प्यार? सही मायनें में प्यार तब होता है जब हम खुद से बाहर निकल कर प्रेम करते हैं, जहां अहं जैसे भाव का कोई स्थान नहीं होता, प्रेमी पात्र की खुशी हमें ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। और जहां अहं नहीं होगा वहां नफरत भी नहीं होगी।............ नाॅट श्योर पर मुझे ऐसा लगता है। या कह सकते हैं मेरे लिए प्यार की यह परिभाषा है।......... बाकी सब....... कैमिकल लोचा है ।-----
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