सोमवार, 31 अगस्त 2015

मेरा तुम्हारा सच

मेरा तुम्हारा सच
तुमने कहा साथ मैनें कहा दोस्ती
तुमने कहा देह मैंने कहा आत्मा
तुमने कहा पा लिया मैंने कहा खो दिया
तुमने कहा अधूरा मैंने कहा पूर्णता
तुमने कहा हिस्सा मैंने कहा जिंदगी
हम अपनी अपनी परिभाषा लिए स्वनिर्मित परीधियों में खड़े रहे
प्रेम यूंही आ कर आस पास से गुजर गया। -अमृता

गैर ज़रूरी यातना

यह अनसुनी असभ्य बर्बरता है कि कोई स्त्री इतनी विकराल यातना सहने को बाध्य हो। इसका ईलाज खोजना चाहिए। यह रुकना चाहिए। यह बड़ी वाहियात बात है कि हमारे आधुनिक विज्ञान के बावजूद पीड़ारहित प्रसव एक हकीकत नहीं बन सका है। यह उतना ही अक्षमम्य है जितना बेहोशी की दवा लिए बिना पथरी निकालने का आॅपरेशन करना। स्त्रियों में कितना शैतानी धैर्य है, बुद्धि का कितना अभाव है, कि वे इस जंगली नरसंहार की मूक शिकार होती चली जा रही हैं। मेरे सामने किसी नारी आंदोलन का नाम नहीं लेना जब तक कि स्त्रियां इसे खत्म करने में सफल नहीं होती! मेरे विचार से यह बिल्कुल व्यर्थ की प्रताड़ना है। बच्चे के जन्म का आॅपरेशन भी दूसरे आॅपरेशनों की तरह दर्दरहित और सहनीय बनाया जाना चाहिए। ऐसा कोई कदम उठाने में आखिर कौन सा अंधविश्वास आड़े आ रहा है? कितनी निर्दयी कितनी आपराधिक अवहेलना है!
---------इजाडोरा की प्रेमकथा।
............. सही बात है मुझे भी लगता है इस पीड़ा को स्त्री क्यों सहने के लिए बाध्य है। बच्चे के जन्म को क्या पीड़ा रहित नहीं बनाया जा सकता? उस तकलीफ को फिर ग्लोरीफाई किया जाता है, अगर मां ने दर्द नहीं सहा तो मां ही नहीं है। सिजेरियन होने पर भी नोर्मल डिलिवरी का दबाव बनाया जाता। जरूरी है स्त्री से इतना कष्ट झेलवाना। समाज में ऐसा माहौल रहता है कि अगर आपने प्रसव की पीड़ा को नहीं झेला तो दूसरी औरत जिसने पीड़ा झेला है खुद को गौरवान्वित महसूस करती हुई ऐसी हिकारत की नजर से देखेगी जैसे तुम क्या मां हो मां तो मैं हूं। ये भी पैट्रीआरिकल माइण्ड सेट की ही तो सोच है। मां, ममता, तकलीफ, दर्द, त्याग, वगैरह वगैरह। इन सब आभूषणों से स्त्री को सुसज्जित करके तकलीफ झेलने के लिए मजबूर करता है समाज। बिना तकलीफ के बच्चा हो जाए तो क्या मां मां नहीं रहेगी, बच्चे से उसका लगाव कम हो जाएगा?...................... एक बात सोच रही थी ।

प्यार और नफ़रत

प्यार और नफरत एक साथ तब ही चलतें हैं जब आपकी भावना खुद से ज्यादा जुड़ी होती है। दूसरे व्यक्ति का स्वतंत्र वजूद वास्तव में आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता। वह बस उस दीवार की तरह होता है जहां से टकराकर आपकी भावनात्मक बाॅल वापिस लौटती है। आप उम्मीद करते हैं कि जितनी शक्ति से आपने उस बाॅल को दीवार की तरफ फेंका है उतनी ही शक्ति से वह वापिस भी हो। दीवार आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं बाॅल आपके लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह आपका है और उसमें लगी शक्ति भी आपकी है। हमें लगता है कि हम दूसरे व्यक्ति से प्यार करते हैं, वास्तव में हम प्यार खुद से करते हैं व्यक्ति विशेष से नहीं। और वह प्यार तभी तक फलता फूलता है जब तक वह आपकी लगाई शक्ति का रिटर्न देता है। अगर नहीं देता तो हम उससे नफरत करने लगते हैं। क्योंकि वह हमारे अहं पर चोट पहुंचाता है। हमारी उस शक्ति के सामने प्रश्न चिन्ह लगाता है जिसके भरोसे हमने अपनी भावनात्मक बाॅल दीवार की तरफ फेंकी थी। यानी हम अपने आप से बाहर तो निकले ही नहीं, फिर किस बात का प्यार? सही मायनें में प्यार तब होता है जब हम खुद से बाहर निकल कर प्रेम करते हैं, जहां अहं जैसे भाव का कोई स्थान नहीं होता, प्रेमी पात्र की खुशी हमें ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। और जहां अहं नहीं होगा वहां नफरत भी नहीं होगी।............ नाॅट श्योर पर मुझे ऐसा लगता है। या कह सकते हैं मेरे लिए प्यार की यह परिभाषा है।......... बाकी सब....... कैमिकल लोचा है  ।-----