यह अनसुनी असभ्य बर्बरता है कि कोई स्त्री इतनी विकराल यातना सहने को बाध्य हो। इसका ईलाज खोजना चाहिए। यह रुकना चाहिए। यह बड़ी वाहियात बात है कि हमारे आधुनिक विज्ञान के बावजूद पीड़ारहित प्रसव एक हकीकत नहीं बन सका है। यह उतना ही अक्षमम्य है जितना बेहोशी की दवा लिए बिना पथरी निकालने का आॅपरेशन करना। स्त्रियों में कितना शैतानी धैर्य है, बुद्धि का कितना अभाव है, कि वे इस जंगली नरसंहार की मूक शिकार होती चली जा रही हैं। मेरे सामने किसी नारी आंदोलन का नाम नहीं लेना जब तक कि स्त्रियां इसे खत्म करने में सफल नहीं होती! मेरे विचार से यह बिल्कुल व्यर्थ की प्रताड़ना है। बच्चे के जन्म का आॅपरेशन भी दूसरे आॅपरेशनों की तरह दर्दरहित और सहनीय बनाया जाना चाहिए। ऐसा कोई कदम उठाने में आखिर कौन सा अंधविश्वास आड़े आ रहा है? कितनी निर्दयी कितनी आपराधिक अवहेलना है!
---------इजाडोरा की प्रेमकथा।
---------इजाडोरा की प्रेमकथा।
............. सही बात है मुझे भी लगता है इस पीड़ा को स्त्री क्यों सहने के लिए बाध्य है। बच्चे के जन्म को क्या पीड़ा रहित नहीं बनाया जा सकता? उस तकलीफ को फिर ग्लोरीफाई किया जाता है, अगर मां ने दर्द नहीं सहा तो मां ही नहीं है। सिजेरियन होने पर भी नोर्मल डिलिवरी का दबाव बनाया जाता। जरूरी है स्त्री से इतना कष्ट झेलवाना। समाज में ऐसा माहौल रहता है कि अगर आपने प्रसव की पीड़ा को नहीं झेला तो दूसरी औरत जिसने पीड़ा झेला है खुद को गौरवान्वित महसूस करती हुई ऐसी हिकारत की नजर से देखेगी जैसे तुम क्या मां हो मां तो मैं हूं। ये भी पैट्रीआरिकल माइण्ड सेट की ही तो सोच है। मां, ममता, तकलीफ, दर्द, त्याग, वगैरह वगैरह। इन सब आभूषणों से स्त्री को सुसज्जित करके तकलीफ झेलने के लिए मजबूर करता है समाज। बिना तकलीफ के बच्चा हो जाए तो क्या मां मां नहीं रहेगी, बच्चे से उसका लगाव कम हो जाएगा?...................... एक बात सोच रही थी ।
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